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‘भारत बिकाऊ नहीं है’- पूर्व हॉकी कोच ने बताया ओलंपिक्स में हिटलर को ध्यानचंद ने दिया था यह जवाब

ओलंपिक्स में भारत को जितनी सफलता हॉकी में मिली है उतनी किसी और अन्य खेल में नहीं। 1928 से 1956 के बीच, भारत ने 6 ओलंपिक्स स्वर्ण पदक जीते हैं। इन छह जीतों में से एक जीत को सबसे अधिक महत्व दिया जाता है, जो 1936 ओलंपिक्स फाइनल में जर्मनी के खिलाफ सामने आई थी।

इस मैच में भारतीय हॉकी टीम ने मेजबान जर्मनी को उनकी सरजमीं पर एडोल्फ हिटलर और 40,000 प्रशंसकों के सामने ओलंपिक्स फाइनल में 8-1 से मात दी थी। जिसमें 6 गोल मेजर ध्यानचंद की हॉकी से निकले थे। उसके बाद जो हुआ शायद वह मैच से भी ज्यादा आकर्षक था।

आईएएनएस से बात करते हुए, भारत के पूर्व हॉकी कोच सैय्यद अली सिब्तेन नकवी ने बताया कि मैच के बाद हिटलर ने दादा ध्यानचंद के खेल की प्रशंसा कि थी और उन्हें जर्मन सेना में शामिल होने को कहा था।

पूर्व हॉकी कोच ने कहा, “यह पुरस्कार वितरण समारोह के दौरान हुआ था और दादा यह बात सुनकर कुछ सेकेंड तक चुप हो गए थे, यहां तक कि पूरे स्टेडियम में शांति हो गई थी और लोग डरे हुए थे कि अगर ध्यानचंद इस प्रस्ताव को ठुकरा देते हैं तो कहीं तानाशाह उन्हें गोली न मार दें।”

पूर्व हॉकी कोच ने आगे बताया, “दादा ध्यानचंद ने उनकी इस बात का जवाब बंद आंखो से दिया और एक भारतीय सैनिक की तरह बोल्ड आवाज में कहा ‘भारत बिक्री के लिए नहीं है’।”

उन्होंने आगे कहा, “पूरे स्टेडियम को आश्चर्यचकित करने के लिए, हिटलर ने उनसे हाथ मिलाने के बजाय उन्हें सैल्यूट करते हुए कहा, ‘जर्मन देश आपको अपने देश भारत और आपके राष्ट्रवाद के प्यार के लिए सलाम करता है।’ उन्हें ‘हॉकी के जादूगर’ का खिताब भी हिटलर ने दिया था। ऐसे खिलाड़ी सदियों में कभी-कभार पैदा होते हैं।”

भारतीय हॉकी टीमें ओलंपिक में उस युग के प्रदर्शन से मेल नहीं खा रही थीं। उस समय और अब के बीच खेले गए खेल के बीच के अंतरों की व्याख्या करते हुए, नकवी ने कहा कि ध्यान कलात्मक हॉकी से शारीरिक फिटनेस में स्थानांतरित हो गया है।

नकवी ने आगे कहा, “वर्तमान में भारतीय टीम को यूरोपियन और ऑस्ट्रेलियन अंदाज में प्रशिक्षित किया जा रहा है और उनके खेलना का अंदाज भी यूरोपियन हैं। ऑस्ट्रेलियाई कोच उन्हें यूरोपीय और भारतीय शैली का एक संयोजन सिखाने की कोशिश कर रहे है, यही वजह है कि वे सफल हैं। हालांकि, वर्तमान भारतीय टीम युवा हैं लेकिन वह लगातार प्रदर्शन करने में विफल हैं। ऐसा अहम मैचों में देखा गया है कि टीम मैचों के महत्वपूर्ण आखिरी मिनटों मैच गंवा बैठती हैं। ऐसे समय पर उनका डिफेंस तेज यूरोपीय टीम के सामने कमजोर दिखता हैं।”

अपने दिनों के खिलाड़ियों के बारे में बात करते हुए, नकवी ने कहा कि हमारे समय पर खिलाड़ी अपने पॉजिशन में मास्टर हुआ करते थे। उन्होंने कहा, “वे कलात्मक ड्रिब्लर हुआ करते थे और विभिन्न स्ट्रोक लगाने में मास्टर्स थे और उनके पास ओलंपिक्स जैसें खेलों में भारत के ध्वज को ऊपर उठाने जज्बा था।”

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ankur patwal

Sports Journalist

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